सुकमा (कांगेर लाइव) - वर्ष 2005 के सलवा जुडूम के दौरान विस्थापन का दंश झेल चुके दक्षिण बस्तर के आदिवासियों के सामने करीब दो दशक बाद एक बार फिर उजड़ने की चिंता है। इस बार वजह पोलावरम परियोजना की संभावित डूब है। कोंटा क्षेत्र के ग्रामीणों का दावा है कि 18 से ज्यादा गांव डूब की जद में आ सकते हैं। उनका कहना है कि सरकार की ओर से अब तक न प्रभावित क्षेत्र का स्पष्ट सर्वे कराया गया है और न ही मुआवजा व पुनर्वास को लेकर स्थिति साफ की गई है।
पोलावरम को लेकर चिंता सिर्फ घर और खेत बचाने तक सीमित नहीं है। दोरला समाज के लोगों का कहना है कि गांव उजड़े तो उनके साथ जल-जंगल-जमीन से जुड़ी जीवनशैली, सामाजिक व्यवस्था, पूजा स्थल, भाषा और सांस्कृतिक परंपराएं भी प्रभावित होंगी। स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों के प्रभावित होने की बात कही जा रही है, लेकिन वर्तमान प्रभावित आबादी का अद्यतन और जनजातिवार सरकारी आंकड़ा सामने आना बाकी है।
दोरला समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल, जाएंगे कहां?
पोलावरम की संभावित डूब से प्रभावित होने वाले समुदायों में दोरला समाज भी प्रमुख है। यह समुदाय पीढ़ियों से जंगल, जमीन और नदी से जुड़ी जीवनशैली के साथ कोंटा क्षेत्र में रह रहा है। उनके लिए जमीन महज संपत्ति नहीं, बल्कि जीवन, आजीविका, संस्कृति और सामाजिक पहचान का आधार है। समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि समय के साथ दोरला आबादी सिमटती गई है। स्थानीय अनुमान के अनुसार कभी यह आबादी 40-50 हजार के आसपास मानी जाती थी, जो अब करीब 30 हजार रह गई है। हालांकि इन आंकड़ों का आधिकारिक सत्यापन जरूरी है। ऐसे में यदि बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ तो समुदाय के सामने अपनी जमीन के साथ भाषा, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान बचाने की चुनौती भी खड़ी हो सकती है।
आंध्र में सर्वे का दावा, छत्तीसगढ़ में इंतजार
ग्रामीण सुब्बा राव के मुताबिक कोंटा क्षेत्र के करीब 18 गांवों में पोलावरम को लेकर चिंता है। उन्होंने कहा कि आंध्रप्रदेश की सीमा से लगे चिंतूर मंडल में सर्वे और पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, जबकि छत्तीसगढ़ के गांवों में अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। उनका कहना है कि पहले शासन को ज्ञापन दिया जाएगा। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं हुई तो ग्रामीण आंदोलन करेंगे। मड़कम मुकेश ने कहा कि ग्रामीणों को यह तक पता नहीं है कि परियोजना से उनका गांव और जमीन किस तरह प्रभावित होगी। न मुआवजे की जानकारी है, न पुनर्वास की और न सर्वे की। उन्होंने सरकार से जल्द स्पष्ट नीति बनाने की मांग की।
मां गांव से कोंटा आईं तो घुटन महसूस हुई
शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता कट्टम सीताराम ने सलवा जुडूम के दौरान अपनी मां के विस्थापन का अनुभव साझा करते हुए बताया कि गांव के खुले वातावरण में गाय-बैल और अन्य पशुओं की देखभाल तथा खेत-खलिहान संभालते हुए उनका जीवन बीता था। सलवा जुडूम के दौरान जब उन्हें कोंटा लाकर बसाया गया तो नया माहौल उन्हें सहज नहीं लगा। सीताराम के मुताबिक उनकी मां घुटन महसूस करती थीं, बीमार पड़ीं और बाद में उनका निधन हो गया। उनका कहना है कि विस्थापन सिर्फ घर और जमीन छोड़ने तक सीमित नहीं होता। इसके साथ जीवन जीने का तरीका, सामाजिक ताना-बाना और सांस्कृतिक परिवेश भी बदल जाता है। नई जगह बसने के बाद आने वाली पीढ़ियों पर दूसरी भाषा और जीवनशैली का प्रभाव बढ़ सकता है। इससे पारंपरिक भाषा, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक पहचान कमजोर होने की आशंका है। उनके अनुसार, पहले संघर्ष और विस्थापन से प्रभावित हो चुके आदिवासी समाज के सामने यदि पोलावरम के कारण दोबारा बड़े पैमाने पर विस्थापन आया, तो इसका असर केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं रहेगा।